Monday, 27 July 2015

कितना प्राचीन है हिंदू धर्म?

कितना प्राचीन है हिंदू धर्म
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भाइयो अभी किसी मुस्लिम ने बोला की इस्लाम तब से है जब से दुनिया है लेकिन मुस्लिम कभी ये बात सिद्ध नहीं कर पाये क्यूंकि केवल क़ुरान मे ही जिक्र मिलता है और दुनिया मे १४०० से पहले कोई सबूत नहीं मिलता इस्लाम का इसलिए आज मे बताओगे की सबसे पहले कौन सा धर्म था और उसके बाद कौन कौन से धर्म आये....... और हा एक बात और बहुत समय पहले पूरी दुनिया के देश आपस मे ही जुड़े हुए थे जिसको जम्बुद्वीप कहा जाता था जिसका सबूत इस लिंक मे है-https://hi.wikipedia.org/wiki/जम्बुद्वीप और केवल भारत मे ही जन-जीवन था और इसका उद्धरण है सिंधु घाटी सभ्यता और कही पे जन-जीवन नहीं था और हर जगह जंगल और रेगिस्तान ही था और धीरे धीरे प्राकृतिक आपदा के कारण देश एक दूसरे से अलग होते गए 

कहते हैं कि एक समय था जबकि संपूर्ण धरती पर सिर्फ हिंदू थे। मैक्सिको में एक खुदाई के दौरान गणेश और लक्ष्मी की प्राचीन मूर्तियां पाई गईं। अफ्रीका में 6 हजार वर्ष पुराना एक शिव मंदिर पाया गया और चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, लाओस, जापान में हजारों वर्ष पूरानी विष्णु, राम और हनुमान की प्रतिमाएं मिलना इस बात के सबूत हैं कि हिंदू धर्म संपूर्ण धरती पर था।

'मैक्सिको' शब्द संस्कृत के 'मक्षिका' शब्द से आता है और मैक्सिको में ऐसे हजारों प्रमाण मिलते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है। जीसस क्राइस्ट्स से बहुत पहले वहां पर हिंदू धर्म प्रचलित था- कोलंबस तो बहुत बाद में आया। सच तो यह है कि अमेरिका, विशेषकर दक्षिण-अमेरिका एक ऐसे महाद्वीप का हिस्सा था जिसमें अफ्रीका भी सम्मिलित था। भारत ठीक मध्य में था।

अफ्रीका नीचे था और अमेरिका ऊपर था। वे एक बहुत ही उथले सागर से विभक्त थे। तुम उसे पैदल चलकर पार कर सकते थे। पुराने भारतीय शास्त्रों में इसके उल्लेख हैं। वे कहते हैं कि लोग एशिया से अमेरिका पैदल ही चले जाते थे। यहां तक कि शादियां भी होती थीं। कृष्ण के प्रमुख शिष्य और महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा अर्जुन ने मैक्सिको की एक लड़की से शादी की थी। निश्चित ही वे मैक्सिको को मक्षिका कहते थे। लेकिन उसका वर्णन बिलकुल मैक्सिको जैसा ही है।

मैक्सिको में हिंदुओं के देवता गणेश की मूर्तियां हैं, दूसरी ओर इंग्लैंड में गणेश की मूर्ति का मिलना असंभव है। कहीं भी मिलना असंभव है, जब तक कि वह देश हिंदू धर्म के संपर्क में न आया हो, जैसे सुमात्रा, बाली और मैक्सिको में संभव है, लेकिन और कहीं नहीं, जब तक वहां हिंदू धर्म न रहा हो। मैं जो यह कुछ उल्लेख कर रहा हूं, अगर तुम इसके बारे में और अधिक जानकारी पाना चाहते हो तो तुम्हें भिक्षु चमन लाल की पुस्तक ‘हिंदू अमेरिका’ देखनी पड़ेगी, जो कि उनके जीवनभर का शोधकार्य है। (स्वर्णिम बचपन : ओशो- प्रवचनमाला सत्र- 6-नानी का प्रेम… भारत एक सनातन)।


हिंदू और जैन धर्म :- 
अब तक प्राप्त शोध के अनुसार हिंदू धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है, लेकिन यह कहना कि जैन धर्म की उत्पत्ति हिंदू धर्म के बाद हुई तो यह उचित नहीं होगा। ऋ‍ग्वेद में आदिदेव ऋषभदेव का उल्लेख मिलता है।

राजा जनक भी विदेही (दिगंबर) परंपरा से थे। वैदिक काल में पहले ऐसा था कि परिवार में एक व्यक्ति ब्राह्मण धर्म में ‍दीक्षा लेता था तो दूसरा जैन। इक्ष्वाकू कुल के लोग हिंदू भी थे और जैन भी। इस देश में दो जड़ें एकसाथ विकसित हुईं। जैसे हमारे दो हाथ हैं जिसके बारे में हम कह नहीं सकते कि पहले कौन से हाथ की उत्पत्ति हुई, उसी तरह जैन पहले या हिंदू? यह कहना अनुचित होगा। 

यहूदी धर्म :-
वैसे हिंदू धर्म के बाद बहुत से प्राचीन धर्मों का उल्लेख किया जा सकता है, जैसे पेगन, वूडू आदि लेकिन हिंदू-जैन के बाद यहूदी धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म था जिसने धर्म को एक नई व्यवस्था में ढाला और उसे एक नई दिशा और संस्कृति दी।यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम) से मानी जाती है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे। पैगंबर अलै. अब्राहम के पहले बेटे का नाम हजरत इसहाक अलै. और दूसरे का नाम हजरत इस्माईल अलै. था। दोनों के पिता एक थे, किंतु माँ अलग-अलग थीं। हजरत इसहाक की माँ का नाम सराह था और हजरत इस्माईल की माँ हाजरा थीं।

हजरत आदम से लेकर अब्राहम और अब्राहम से लेकर मूसा तक की परंपरा यहूदी धर्म का हिस्सा है। ये सभी कहीं न कहीं हिंदू धर्म की परंपरा से जुड़े थे। ऐसा माना जाता है कि राजा मनु को ही यहूदी लोग हज. नूह कहते थे।

पारसी धर्म : -
यहूदी धर्म के बाद वैदिक धर्म से ही पारसी धर्म का जन्म हुआ। पारसी धर्म के स्थापक अत्री ऋषि के कुल से थे। पारसी धर्म का उदय ईसा से 700 वर्ष पूर्व पारस (ईरान) में हुआ। पारस को बाद में फारस कहा जाने लगा। फारस पर पारसियों का शासन था। यह पारसी धर्म के लोगों की मूल भूमि है। पारसी धर्म के संस्थापक है जरथुस्त्र।

ईरानी लोग जो पारसी धर्म का पालन करते थे, इस्लाम के लगातार हो रहे आक्रमण को झेल नहीं पाए। 7वीं सदी में मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद पारसियों ने पलायन कर भारत में शरण ली। अब फारस ईरान के रूप में एक मुस्लिम राष्ट्र है।

बौद्ध धर्म :-
यहूदी धर्म के बाद पांच सौ ई पू अस्तित्व में आया पांचवां सबसे बड़ा धर्म- बौद्ध धर्म। बौद्ध धर्म के संस्थापक थे भगवान बुद्ध। बुद्ध स्वयं हिंदू थे। बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का सबसे नवीनतम और शुद्ध संस्करण माना जाता था।

बौद्ध काल आते-आते हिंदू धर्म बिगाड़ का शिकार हो चला था। लोग वैदिक मार्ग को छोड़कर पुराणिकों के बहुदेववादी मार्ग पर चलने लगे थे। भगवान बुद्ध ने पहली दफे धर्म को एक वैज्ञानिक व्यवस्था दी और समाज को एकजुट किया, लेकिन शंकराचार्य के बाद हिंदुओं का बौद्ध धर्म में दीक्षा लेना रुक गया।

ईसाई धर्म :-
बौद्ध धर्म के बाद आज से 2 हजार वर्ष पूर्व ईसाई धर्म की शुरुआत की ईसा मसीह से। ईसाई धर्म से पूर्व कोई भी धर्म किसी दूसरे धर्म के प्रति हिंसक नहीं था लेकिन ईसाई धर्म ने दुनिया को धर्म के लिए क्रूसेड करना सिखाया। इतिहास गवाह है कि दुनियाभर में क्रूसेडर्स ने निर्मम तरीके से दूसरे धर्म के लोगों की हत्या कर ईसाई धर्म को दुनियाभर में जबरन फैलाया।

शुरुआत में जीसस क्राइस्ट के 12 शिष्यों ने इस धर्म का प्रचार-प्रसार किया। बाद में यह धर्म जब स्थापित हो गया तो इसे इसके अनुयायियों ने युद्ध और क्रूसेड के दम पर दुनियाभर में फैलाया। क्राइस्ट के शिष्यों और बाद के ईसाइयों ने ईसाई धर्म को संगठित कर उसे चर्च के अधीन बनाया। इसके लिए उन्होंने बहुत कुछ यहूदी और बौद्ध धर्म से ग्रहण किया।

इस्लाम :-
ईसाई धर्म के बाद आज से 1400 वर्ष पूर्व यानी छठी सदी में इस्लाम धर्म की स्थापना हुई। ह. मोहम्मद ने इस धर्म की शुरुआत की और देखते ही देखते यह धर्म मात्र 100 वर्ष में पूरे अरब का धर्म बन गया। विद्वान लोग इसे पूरी तरह से यहूदी-वैदिक धर्म का मिला-जुला रूप मानते हैं।

हजरत मोहम्मद से पहले अरब में धर्म के मनमाने रूप प्रचलित हो चले थे और धर्म ‍पूरी तरह से बिगाड़ का शिकार था। हजरत मोहम्मद ने धर्म को एक नई व्यवस्था दी ताकि लोग धर्म का अच्छे से पालन कर सकें और सामाजिक अनुशासन में रहें।

सिख धर्म :-
जब अरब, तुर्क और ईरान के कारण हिंदू धर्म खतरे में था, चारों ओर युद्ध चल रहा था ऐसे में गुरु नानकदेवजी ने आकर लोगों में भाईचारे और विश्वास का माहौल बनाया। उनका जन्म कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन 1469 को राएभोए की तलवंडी नामक स्थान में हुआ था। तलवंडी को ही अब नानक के नाम पर ननकाना साहब कहा जाता है, जो कि अब पाकिस्तान में है।

सिख परंपरा में दस गुरुओं ने मिलकर सिख धर्म को मजबूत किया। अंतिम गुरु गुरुगोविंद सिंहजी ने सिख धर्म को विश्व का सबसे शक्तिशाली धर्म बनाया।

तो ये थे वह धर्म जिनके नाम से सभी लोग परिचित हैं। हिंदू, जैन, यहूदी, पारसी, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम और सिख धर्म। लेकिन इन प्रमुख धर्मों के अलावा भी धरती पर और भी कई धर्म थे जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं।

शिंतो धर्म : जापान के शिंतो धर्म की ज्यादातर बातें बौद्ध धर्म से ली गई थीं फिर भी इस धर्म ने अपनी एक अलग पहचान कायम की थी। इस धर्म में कालांतर में प्राकृतिक शक्तियों, महान व्यक्तियों, पूर्वजों तथा सम्राटों की भी उपासना की जाती थी, किंतु बौद्ध धर्म के प्रभाव से सारी रूढ़ियाँ छूट गईं लेकिन 1868-1912 में शिंतो धर्म ने बौद्ध विचारों से स्वतंत्र होकर अपने धार्मिक मूल्यों की पुन: व्याख्‍या और स्थापना कर इसे जापान का 'राजधर्म' बना दिया गया।

जेन धर्म :-
जेन (zen) को झेन भी कहा जाता है। यह सम्प्रदाय जापान के सेमुराई वर्ग का धर्म है। जेन का विकास चीन में लगभग 500 ईस्वी में हुआ। चीन से यह 1200 ईस्वी में जापान में फैला। प्रारंभ में जापान में बौद्ध धर्म का कोई संप्रदाय नहीं था किंतु धीरे-धीरे वह बारह सम्प्रदायों में बँट गया जिसमें जेन भी एक था। हालांकि चीन में लाओत्से और कन्यूशियस की विचारधारा भी थी।

पेगन धर्म :-
पेगन धर्म को मानने वालों को जर्मन के हिथ मूल का माना जाता है, लेकिन ये रोम, अरब और अन्य इलाकों में भी बहुतायत में थे, हालाँकि इसका विस्तार यूरोप में ही ज्यादा था। एक मान्यता अनुसार यह अरब के मुशरिकों के धर्म की तरह था और इसका प्रचार-प्रसार अरब में भी काफी फैल चुका था। यह धर्म ईसाई धर्म के पूर्व अस्तित्व में था।

जानें वूडू धर्म को : वूडू... इसे आप कोई भी नाम दे सकते हैं, क्योंकि यह ‍दुनियाभर की आदिम जातियों, आदिवासियों का प्रारंभिक धर्म रहा है। इस तरह की परंपरा को अंग्रेजी में टेबू कह सकते हैं। यह आज भी दुनियाभर में जिंदा है। नाम कुछ भी हो, पर इसे आप आदिम धर्म कह सकते हैं। इसे लगभग 6,000 वर्ष से भी ज्यादा पुराना धर्म माना जाता है।

मुशरिकों का धर्म :-
600 ईसा पूर्व ईस्वी से पूर्व इस्लाम से पहले अरब में तीन परंपरा प्रचलन में थी। एक अरब का पुराना धर्म जिसे दीने इब्राहीमी कहा जाता था। यह इब्राहीमी धर्म ही बिगाड़ का शिकार होकर मुशरिकों का धर्म बन चुका था। दूसरा यहूदी धर्म और तीसरा ईसाई धर्म। मुशरिकों में से कुछ मुसलमान बन गए और कुछ जंग में मारे गए। इस्लाम की लड़ाई जहां मुशरिकों से थे वहीं यहूदी और ईसाइयों से भी थी। इस कशमकश में इस्लाम जीतता गया।

मुशरिक अपने पूर्वजों और योद्धाओं की कब्रों की पूजा करते थे और उनसे आशीर्वाद मांगते थे। मुशरिक काबा को अपना इबादतगाह मानते थे। काबा में 300 से ज्यादा मूर्तियां रखी थीं और उसके आसपास कब्रें थीं। यहूदी भी यहीं पूजा करते थे।

मुशरिक बहुदेववादी और मूर्तिपूजक थे। बहुत से विद्वान मानते हैं कि ये सभी हिंदू थे व इनका समाज मुशरिक था, लेकिन हिंदू विद्वान इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। इस पर विवाद हैं। मुशरिक का अर्थ होता है ईश्वर को छोड़कर या ईश्वर के अतिरिक्त अन्य को पूजने वाला बहुदेववादी। हिंदू तो एकेश्वरवादी धर्म है।

इराक और सीरिया में सुबी नाम से एक जाति है यही साबिईन है। इन साबिईन को अरब के लोग हिंदू मानते थे। साबिईन अर्थात नूह की कौम। भारतीय मूल के लोग बहुत बड़ी संख्या में यमन में आबाद थे, जहां आज भी श्याम और हिंद नामक किले मौजूद हैं।

इस्लाम ने जब अरब से बाहर कदम रखा तो उनका पहला सामना पारसी धर्म के लोगों से हुआ। उन्होंने पारसी धर्म के लोगों को ईरान से खदेड़ दिया उसी तरह जिस तरह की अफगानिस्तान और पाकिस्तान से हिंदू और बौद्धों को खदेड़ दिया।
जब हम इतिहास की बात करते हैं तो वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है अर्थात ये धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: कृष्ण के समय में वेदव्यास द्वारा पूरी तरह से वेद को चार भागों में विभाजित कर दिया गया। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5500 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूंढ लिए गए।

हिंदू और जैन धर्म की उत्पत्ति पूर्व आर्यों की अवधारणा में है, जो 4500 ई.पू. (आज से 6500 वर्ष पूर्व) मध्य एशिया से हिमालय तक फैले थे। कहते हैं कि आर्यों की ही एक शाखा ने पारसी धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमश: यहूदी धर्म 2 हजार ई.पू., बौद्ध धर्म 500 ई.पू., ईसाई धर्म सिर्फ 2000 वर्ष पूर्व, इस्लाम धर्म 1400 साल पहले हुए।

लेकिन धार्मिक साहित्य अनुसार हिंदू धर्म की कुछ और धारणाएं भी हैं। मान्यता यह भी है कि 90 हजार वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत हुई थी। जवाहरलाल नेहरू कि 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' और रामशरण उपाध्याय की किताब 'बृहत्तर भारत' में हिंदू धर्म और भारत के इतिहास के बारे में विस्तार से मिल सकता है।

Saturday, 25 July 2015

हज के दौरान हिन्दू धर्म के ही नियमो का पालन होता है

न केवल भारत महाद्वीप के मुस्लिम हिन्दू हैं ;बल्कि हर मुस्लिम (न जानते/मानते हुये भी )हिन्दू धर्म के ही नियमो का पालन करता है हज के दौरान....
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काबा मंदिर पर जाकर मुस्लिम हज तीर्थयात्री इसके चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हैं। क्या कोई मुस्लिम किसी अन्य मस्जिद में परिक्रमा करता है। हिंदुओं को ही अनिवार्य है अपने देवता व मंदिर की प्रदक्षिणा।
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मुसलमानों को हज के समय अपने सिर और दाढ़ी के बाल हटाना और सफेद कपड़े के दो निर्बाध पत्रक पहनना आवश्यक हैं ।ये मुस्लिम की विशेष पोशाक नहीं है। 
मुसलमान तो हर जगह अपनी गन्दी बढ़ी हुई दाढ़ी में ही दीखते हैं।
ये इन्होंने कहाँ से ली?
ये दोनों संस्कार स्वच्छ होना और पवित्र सहज सफेद चादर के साथ हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने की पुरानी वैदिक अभ्यास के अवशेष हैं।
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काबा के साथ जुड़ी एक और हिंदू परंपरा है पवित्र धारा गंगा (गंगा नदी के पवित्र जल) का है।
हिंदू परंपरा के अनुसार गंगा भी चाँद सहित शिव के प्रतीक रूप है और शिव की मूर्ति का अविभाज्य अंग है। एक शिव प्रतीक चाँद जहाँ भी है, तो गंगा को भी मौजूद होना चाहिए। एक पवित्र झरना काबा के पास मौजूद है ।
यह परंपरागत रूप से इस्लाम पूर्व लोगों के समय से गंगा (जम जम पानी ) के रूप में मानते है, और इसका पानी पवित्र माना जाता है।

अरब का प्राचीन धर्म कौन सा था


भाइयो ये पोस्ट मे इसलिए डाल रहा हू की कुछ समय पहले किसी मुस्लिम ने मुझसे ये पूछा था की अरब का इतिहास क्या है तुम ही मुझे बताओ इसलिए आज मे अरब का इतिहास बता रहा हू और अरब का प्राचीन धर्म कौन सा था ......................................................................
अरबियों का प्रचीन धर्म कौन सा था ?
येरुश्लम ( ईज़राईल ) जिसको अरबी में "बैत् अल मुकद्दस" यानी कि पवित्र स्थान बोला जाता है । ईसाई, यहूदी और मुसलमान इसे पवित्र स्थान मानते हैं । जिसमें एक ८ लाख दिनार का एक पुस्तकालय है जो कि तुर्की के गवर्नर ने सुल्तान अब्दुल हमीद के नाम पर बनवाया था ।
# इस पुस्तकालय में हज़ारों की संख्या में प्राचीन पाण्डुलिप्पियाँ संगर्हित हैं जो कि ऊँट की झिल्लियों, खजूर के पत्तों , जानवर के चमड़ों पर लिखी हुईं हैं । इनमें अरबी, इब्रानी, सिरियानी, मिश्री भाषाओं में लिखे भिन्न काल के सैंकड़ों नमूने हैं ।
 इनमें ऊँट कि झिल्ली पर लिखी एक पुस्तक है जिसका नाम है "सैरुलकूल" जो कि अरब के प्रचीन कवियों का इतिहास है । जिसका लेखक है "अस्मई" ।
 इस्लाम के इतिहास में जगद्विख्यात बादशाह हुए हैं जो कि अलिफ लैला की कहानियों के कारण प्रसिद्ध हुए हैं । इनका नाम था "खलीफा हारूँ रशीद" आज से करीब 1336 वर्ष पहले ।
 और यही "अस्मई" नामक लेखक खलीफा के दरबार में शोभायमान था जिसने प्राचीन अरबीयों का इतिहास बड़ी मेहनत से अपनी पुस्तक "सैरुलकूल" में लिखा था ।
तो अस्मई ने बादशाह को दरबार में जो लिखा हुआ इतिहास था वह कुछ ऐसे सुनाया :--
(१) मक्का नगर में एक मंदिर था । जिसको सभी अरबवासी पवित्रस्थान मानते थे । वहाँ दर्शन करने को जाने वाले यत्रीयों के साथ बहुत लूटपाट होती रहती थी और कई बार हत्याएँ होती रहती थीं । जिससे कि यात्रीयों की संख्या में कमी ही देखने को मिलती थी तो ऐसे में अरब की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना ही था । जिसे रोकने के लिए अरब वासियों ने चार ऐसे महीने निश्चित किया जिसे कि "अशहरुलहराम" ( पवित्र मास ) कहा जाता है । इन महीनों में मेला लगता था जिसे कि "अकाज़ " कहा जाता था ।
(२) अकाज़ में कवि सम्मेलन रखा जाता था । दूर दूर से अरबी कवि अपनी कविताएँ ( कसीदे ) पढ़ने के लिए आया करते थे । जिन १० कवियों की कविताएँ सबसे श्रेष्ठ और उत्तम होती थीं । उनको सोने की पट्टियों पर खुदवा कर या फिर ऊँट की झिल्लियों पर या खजूर के पत्तों पर लिखवाकर मक्का मंदिर में सुरक्षित रखा जाता था । और कवि शिरोमणियों को बहुत भारी ईनाम दिए जाते थे ।
(३) ऐसे ही हर वर्ष कवि सम्मेलन होते रहते थे और अरबी कसीदे मक्का के अंदर सुरक्षित रखे जाते थे ।
(४) जब मुहम्मद साहब ने ईस्लाम का झंडा बुलंद करके यहूदियों की खैबर की बस्ती उजाड़ कर मक्का पर आक्रमण किया तो तब वहाँ पर पड़ी 360 मूर्तीयाँ और अरबी कसीदे तहस नहस करवाने शुरू कर दिए । लेकिन मुहम्मद साहब के लशकर में एक "हसन बिन साबित" नाम का अरबी कवि भी था । जो कि साहित्य प्रेमी होने के कारण मुहम्मद साहब के द्वारा हो रहे कसीदों के नाश को सहन न कर सका । और बहुत से बहुमूल्य कसीदे अपने साथ लेकर सुरक्षित मक्का से निकल गया । और उन कसीदों को अपने पास सुरक्षित रखा ।
(५) ये कसीदे "हसन बिन साबित" के देहान्त के बाद उसकी तीसरी पीढ़ी में "मस्लम बिन अस्लम बिन हसान" के पास परम्परा से आए । और उसी समय में बगदाद में एक "खलीफा हारूँ रशीद" नाम का विख्यात साहित्य प्रेमी था । जिसकी चर्चा दूर दूर तक थी । उससे प्रभावित होकर मस्लम ये कसीदे लेकर मदीना से बगदाद रवाना हुआ ।
(६) मसल्म ने वे कसीदे मुझे ( अस्मई को ) दिखाए । जिनकी संख्या 11 हैं । तीन कसीदे तो एक ही कवि जिसका नाम "लबी बिन अख़्तब बिन तुर्फा" के हैं जो सोने के पत्रों पर अंकित हैं । बाकी 8 कसीदे ऊँट की झिल्लियों पर अन्य कवियों के हैं । ये लबी नामक कवि मुहम्मद साहब से 2300 साल पुराना है । { यानि कि आज से 1336 + 2300 = 3636 वर्ष पुराना हुआ }
(७) मस्लम को 'हजरत अमीरुलमोमीन' ने इसके लिए बहुत बड़ा ईनाम दिया है ।
लबि बिन अख़्तब बिन तुर्फा ने जो अरबी शेयर लिखे हैं उनमें से पाँच शेर इस पुस्तक "सैरुलकूल" में लिखे हैं जिनको अस्मई ने बादशाह के दरबार में पेश किया था :-
(1) अया मुबारक -अल- अर्जे युशन्निहा मिन-अल-हिन्द । व अरदिकल्लाह यन्नज़िजल ज़िक्रतुन ।।
अर्थात :- अय हिन्द की पुन्य भूमि तूँ स्तुति करने के योग्य है क्योंकि अल्लाह ने अपने अलहाम अर्थात् दैवी ज्ञान को तुझ पर उतारा है ।
(2) वहल बहलयुतुन अैनक सुबही अरब अत ज़िक्रू । हाज़िही युन्नज़िल अर रसूलु मिन-आल-हिन्दतुन ।।
अर्थात् :- वो चार अलहाम वेद जिनका दैवी ज्ञान ऊषा के नूर के समान है हिन्दुस्तान में खुदा ने अपने रसूलों पर नाज़िल किए हैं ।
(3) यकूलून-अल्लाहा या अहल- अल- अर्ज़े आलमीन कुल्लहुम । फत्तबाऊ ज़िक्रतुल वीदा हक्क़न मालम युनज्ज़िलेतुन ।
अर्थात् :- अल्लाह ने तमाम दुनिया के मनुष्यों को आदेश दिया है कि वेद का अनुसरण करो जो कि निस्सन्देह मेरी ओर से नाज़िल हुए हैं ।
(4) य हुवा आलमुस्साम वल युजुर् मिनल्लाहि तन्ज़ीलन् । फ़-ऐनमा या अख़ीयु तबिअन् ययश्शिबरी नजातुन् ।।
अर्थात् :- व ज्ञान का भँडार साम और यजुर हैं जिनको अल्लाह ने नाज़िल किया है । बस भाईयों उसी का अनुसरण करो जो हमें मोक्ष का ज्ञान अर्थात् बशारत देते हैं ।
(5) व इस्नैना हुमा रिक् अथर नाहिसीना उख़्वतुन् । व अस्ताना अला ऊँदव व हुवा मशअरतुन् ।।
अर्थात् :- उसमें से बाकी के दो ऋक् और अथर्व हैं जो हमें भ्रातृत्व का ज्ञान देते हैं । यो कर्म के प्रकाश स्तम्भ हैं, जो हमें आदेश देते हैं कि हम इन पर चलें ।
अब इन पाँच शेयरों से स्पष्ट है कि लबी नामक कवि वेदों के प्रती कितना आस्थावान था । और उन प्रमाणों को पढ़कर कोई मुसलमान भी नहीं मुकर सकता है क्योंकि वेदों न नाम स्पष्ट आया है । और न हि ये कह सकता है कि ये वो वाले वेद नहीं जिसको आर्य लोग मानते हैं । भारत में ही ब्राह्मणों की पतित शाखा थी जिसको शैख बोला जाता था । वही ईरान होते हुए अरब में बसी है । क्योंकि अरब में घोड़े उत्तम नसल के पाए जाते हैं ( आज भी ) । तो जिस देश में उत्तम घोड़े हों उस स्थान को शैख ब्राह्मणों ने अर्व नाम दिया था । अर्वन् संस्कृत नाम है घोड़े का । और अर्व कहते हैं अश्वशाला को । मुहम्मद साहब के कुछ समय पहले तक अरब में शैवमत, बौद्धमत और वाममार्ग का प्रचार रहा है जिस कारण मुहम्मद साहब को बौद्धों के मूर्तीयों से उग्र घृणा हो गई थी । जिसको उन्होंने बुतपरस्त कहा है । इसका प्रमाण हम अगले लेख में डालेंगे कि मुहम्मद साहब के समय में अरब में कौनसा धर्म प्रचलित था ।
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Sunday, 28 June 2015

आखिर हिन्दू होने इतना गर्व क्यों...!!

 आखिर हिन्दू होने  इतना गर्व क्यों...!!!
आइये जानते हैं कि सनातन धर्म पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ क्यों है..??
कुछ लोग हिन्दू संस्कृति की शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़कर देखते हैं। जो गलत है।
वास्तव में संस्कृत और कई प्राचीन भाषाओं के इतिहास के तथ्यों के अनुसार प्राचीन भारत में सनातन धर्म के इतिहास की शुरुआत ईसा से लगभग 13 हजार पूर्व हुई थी अर्थात आज से 15 हजार वर्ष पूर्व। इस पर विज्ञान ने भी शोध किया और वह भी इसे सच मानता है।
जीवन का विकास भी सर्वप्रथम भारतीय दक्षिण प्रायद्वीप में नर्मदा नदी के तट पर हुआ, जो विश्व की सर्वप्रथम नदी है। यहां पूरे विश्व में डायनासोरों के सबसे प्राचीन अंडे एवं जीवाश्म प्राप्त हुए हैं।
संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। ‘संस्कृत’ का शाब्दिक अर्थ है ‘परिपूर्ण भाषा’। संस्कृत से पहले दुनिया छोटी-छोटी, टूटी-फूटी बोलियों में बंटी थी जिनका कोई व्याकरण नहीं था और जिनका कोई भाषा कोष भी नहीं था। भाषा को लिपियों में लिखने का प्रचलन भारत में ही शुरू हुआ। भारत से इसे सुमेरियन, बेबीलोनीयन और यूनानी लोगों ने सीखा।
ब्राह्मी और देवनागरी लिपियों से ही दुनियाभर की अन्य लिपियों का जन्म हुआ। ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिसे देवनागरी लिपि से भी प्राचीन माना जाता है।
हड़प्पा संस्कृति के लोग इस लिपि का इस्तेमाल करते थे, तब संस्कृत भाषा को भी इसी लिपि में लिखा जाता था।
जैन पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सभ्यता को
मानवता तक लाने वाले पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की एक बेटी थी जिसका नाम ब्राह्मी था। उसी ने इस लेखन की खोज की।
प्राचीन दुनिया में सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे बसी सभ्यता सबसे समृद्ध, सभ्य और बुद्धिमान थी। इसके कई प्रमाण मौजूद हैं। यह वर्तमान में अफगानिस्तान से भारत तक फैली थी।
प्राचीनकाल में जितनी विशाल नदी सिंधु थी उससे कहीं ज्यादा विशाल नदी सरस्वती थी। दुनिया का पहला धर्मग्रंथ सरस्वती नदी के किनारे बैठकर ही लिखा गया था।
पुरातत्त्वविदों के अनुसार यह सभ्यता लगभग 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी, 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और लगभग 1800 ईसा पूर्व आते-आते किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण यह लुप्त हो गया। एक ओर जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्चिम की ओर पलायन कर दिया।
सैकड़ों हजार वर्ष पूर्व पूरी दुनियाँ के लोग कबीले, समुदाय, घुमंतू वनवासी आदि में रहकर जीवन-यापन करते थे। उनके पास न तो कोई स्पष्ट शासन व्यवस्था थी और न ही कोई सामाजिक व्यवस्था। परिवार, संस्कार और धर्म की समझ तो बिलकुल नहीं थी। ऐसे में केवल भारतीय हिमालयन क्षेत्र में कुछ मुट्ठीभर लोग थे, जो इस संबंध में सोचते थे। उन्होंने ही वेद को सुना और उसे मानव समाज को सुनाया। उल्लेखनीय है कि प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज कबीले में नहीं रहा। वह एक वृहत्तर और विशेष समुदाय में ही रहा।
संपूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए-नए रूप में स्थापना की थी? आज दुनियाभर की
धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी धर्म हो, पारसी धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो।
क्योंकि
ईसा से 2300-2150 वर्ष पूर्व सुमेरिया, 2000-400
वर्ष पूर्व बेबिलोनिया, 2000-250 ईसा पूर्व ईरान,
2000-150 ईसा पूर्व मिस्र (इजिप्ट), 1450-500
ईसा पूर्व असीरिया, 1450-150 ईसा पूर्व ग्रीस
(यूनान), 800-500 ईसा पूर्व रोम की सभ्यताएं
विद्यमान थीं।
परन्तु इन सभी से भी पूर्व अर्थात आज से 5000 वर्ष पहले महाभारत का युद्ध लड़ा गया था।
महाभारत से भी पहले 7300 ईसापूर्व अर्थात आज से 7300+2000=9300 साल पहले रामायण का रचनाकाल प्रमाणित हो चुका है।
अब चूँकि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में उससे भी पहले लिखी गई मनुस्मृति का उल्लेख आया है तो आइये अब जानते हैं रामायण से भी प्राचीन मनुस्मृति कब लिखी गई.........!!!
किष्किन्धा काण्ड में श्री राम अत्याचारी बाली को घायल कर उन्हें दंड देने के लिए मनुस्मृति के श्लोकों का उल्लेख करते हुए उसे अनुजभार्याभिमर्श का दोषी बताते हुए कहते हैं- मैं तुझे यथोचित दंड कैसे ना देता ?
श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्र वत्सलौ ।।
गृहीतौ धर्म कुशलैः तथा तत् चरितम् मयाअ ।।
वाल्मीकि ४-१८-३०
राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ।।
वाल्मीकि ४-१८-३१
शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते ।
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् ।
वाल्मीकि ४-१८-३२
उपरोक्त श्लोक ३० में मनु का नाम आया है और श्लोक
३१ , ३२ भी मनुस्मृति के ही हैंl
ॐ🚩卐

Tuesday, 23 June 2015

अपने माता पिता का सम्मान करने के तरीके!!

अपने माता पिता का सम्मान करने के तरीके!!
1. उनकी उपस्थिति में अपने फोन को दूर रखो
2. वे क्या कह रहे हैं इस पर ध्यान दो
3. उनकी राय स्वीकारें
4. उनकी बातचीत में सम्मिलित हों
5. उन्हें सम्मान के साथ देखें
6. हमेशा उनकी प्रशंसा करें
7. उनको अच्छा समाचार जरूर बताएँ
8. उनके साथ बुरा समाचार साझा करने से बचें
9. उनके दोस्तों और प्रियजनों से अच्छी तरह से बोलें
10. उनके द्वारा किये गए अच्छे काम सदैव याद रखें
11. वे यदि एक ही कहानी दोहरायें तो भी ऐसे सुनें जैसे पहली बार सुन रहे हो
12. अतीत की दर्दनाक यादों को मत दोहरायें
13. उनकी उपस्थिति में कानाफ़ूसी न करें
14. उनके साथ तमीज़ से बैठें
15. उनके विचारों को न तो घटिया बताये न ही उनकी आलोचना करें
16. उनकी बात काटने से बचें
17. उनकी उम्र का सम्मान करें
18. उनके आसपास उनके पोते/पोतियों को अनुशासित करने अथवा मारने से बचें
19. उनकी सलाह और निर्देश स्वीकारें
20. उनका नेतृत्व स्वीकार करें
21. उनके साथ ऊँची आवाज़ में बात न करें
22. उनके आगे अथवा सामने से न चलें
23. उनसे पहले खाने से बचें
24. उन्हें घूरें नहीं
25. उन्हें तब भी गौरवान्वित प्रतीत करायें जब कि वे अपने को इसके लायक न समझें
26. उनके सामने अपने पैर करके या उनकी ओर अपनी पीठ कर के बैठने से बचें
27. न तो उनकी बुराई करें और न ही किसी अन्य द्वारा की गई उनकी बुराई का वर्णन करें
28. उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करें
29. उनकी उपस्थिति में ऊबने या अपनी थकान का प्रदर्शन न करें
30. उनकी गलतियों अथवा अनभिज्ञता पर हँसने से बचें
31. कहने से पहले उनके काम करें
32. नियमित रूप से उनके पास जायें
33. उनके साथ वार्तालाप में अपने शब्दों को ध्यान से चुनें
34. उन्हें उसी सम्बोधन से सम्मानित करें जो वे पसन्द करते हैं
35. अपने किसी भी विषय की अपेक्षा उन्हें प्राथमिकता दें
माता – पिता इस दुनिया में सबसे बड़ा खज़ाना हैं..!!
Ways to honor your parents!

1. put your phone away in his presence 
2. Focus on what they are saying two 
3. Accept their opinion 
4. Join in their conversation.
5 View with respect to them. 6Always praise 
7. They tell of course good news. 8Avoid sharing bad news with them 
9. Their friends and loved ones say well 
10. They have good work always remember 
11. They listen to a story even if such dohrayen as the first listening 12. Painful memories of the past to do dohrayen 
13. Do not kanafusi in his presence. 
14. Sitting with them discernment to 
15. Their ideas, their criticism are revealed neither cheap nor 
16. Listen to avoid cutting 
17. Respect of their age.
18. Their grandchildren around them to avoid or kill/disciplined about 
19. Accept their advice and instructions. 
20. Accept his leadership. 
21. Don't talk loud voice with them 22. From in front of their head forward or 
23. Avoid eating before them. 
24. They don't ghuren 
25. They even seemed proud to submit that they do not deserve to understand 
26. In front of them by their feet or sit by their side avoid your back 
27. Neither their evil, nor any other describe their evil by 
28. Include them in your prayers. 29. Ubne in his presence or not of your fatigue performance. 
30. Avoid their mistakes or laugh at the ignorance. 
31. Suffice to say, his work before 32. Regularly they have taken 
33. Their select your words carefully in conversation with 
34. Like them, who they are conferred remarks 
35. Expect any topic they prefer mother – father in this world are the greatest treasure!!

Thursday, 18 June 2015

पप्पू जी के बारे मे कुछ जानकारी

हिंदी ओर अंग्रेजी दोनो भाषा मे 
अब तो पप्पू जी को गरीबो की किसानो की बड़ी याद आती है पिछले  10-15 वर्षो से तो सक्रिय राजनीति मे है कभी किसी किसान से   उसके घर मिलने नही  गए 
लगता है किसानो ने आत्मदाह करना अभी सिखा है पिछले एक वर्ष  मे ही किसान मरा है लेकिन एसा नही है क्यूंकि किसान मरे एसे हालात तो बनाने का काम तो जवाहर लाल नेहरू ने ही बनाने सरू कर दिये थे
 कांग्रेस ने किसानो के भले के लिए क्या किया है वही  4 वर्ष कुछ नही  चुनाव के   साल खुब बोनस देकर लुटा है 
कुछ बुजुर्ग लोग कहते है कि कांग्रेस ने आजादी दिलवाई लेकिन अब उन्हे कोन समझाए कि उस कांग्रेस के नेता कोई ओर थे जो कि देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया करते थे लेकिन नेहरू जेसे लोगो ने उन्हें मरवा दिया ओर देश को अपने  गुलाम कर लिया अगर देश मे विकास होगा तो नेहरू ने सोचा कि आपनी पोल खुल जाएगी ऊस समय खेती पर निर्भर करता था देश का विकास तो सोचा कि किसान को  ऐसे तो मार नही सकते क्यों ना इसे धीरे धीरे  मारे जोकि किसान आज मर रहा है 
जो किसान मर रहे है उनके ये हालात अभी तो खराब हुए नही है 
कब तक कांग्रेस किसान के नाम पर राजनीति करती रहेगी 
कोई भी किसान के खेत को सरकार अधिकतर करती है तो वह किसान खुश होता है कि उसकी जमीन की कीमत कई गुना ज्यादा दी जाती है 
और कांग्रेस कहती है कि किसानो की या फिर किसी की भी जमीन ना लो और विकास  करो मोदी जी क्या जमिन चाँद से लाए 
देश के विकास के लिए फेक्ट्री, सङकों के लिए जमीन अधिग्रहण बिल का पास होना जरूरी है 
धन्यवाद दोस्तो 
एक अपने अच्छे दोस्त से जरूर शयेर करेंगे 
जय जवान 
 जय किसान 
Now, large farmers of pappu-ji garibo miss the last 10-15 years, active in politics ever meet her house were not farmer seems to teach farmers to self immolation is just in the past year as farmers dead, but this is not because the farmer dead, a work of making things Jawaharlal Nehru were given by Congress to make the farmers of Cypress regardless of what Some 4 years have not the same election year, some elderly people by khub bonus luta points out that Congress has his freedom but now they cone convinced that Congress leaders were a side that country used its responsibility towards subsistence but Nehru gave them such as marva logo took his slave to the country if the country will develop in the Nehru thought that will open your pole industry Time depended on farming land development so thought why not kill a farmer can then right it slowly is dying today which killed peasant farmers are dying, their situation is not bad these just how long that Congress will name farmer politics any farmer's farm that the Government is mostly the farmers would be happy that its land price gave several times more And Congress says that's not the ground or of farmers and development brought from Moon-ji do what Modi jamin phektri for the development of the country, near the land acquisition Bill for sangkon must thank you friends will definitely share your good friend Jai jawan Jai Kisan 

Saturday, 13 June 2015

1984 का दंगा : रोंगटे खड़े कर देने वाला सच....




1984 का दंगा : रोंगटे खड़े कर देने वाला सच....
31 अक्टूबर 1984 को देश की राजधानी दिल्ली में अफरातफरी मची थी क्योंकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से हर कोई स्तब्ध था. ऐसे नाजुक माहौल में इंदिरा के बेटे राजीव ने देश की कमान संभाली....जिस वक्त राजीव गांधी देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की शपथ ले रहे थे. उसी वक्त दिल्ली की सड़कों पर एक अजीब सा शोर उठने लगा. एक ऐसा शोर, जिससे इंदिरा की मौत के बाद पसरा सन्नाटा टूटने लगा.....“खून का बदला खून”, “सरदार गद्दार हैं”. कुछ ऐसे नारों के साथ शुरू हुआ हिंसा का वह तांडव जिसे कभी कोई याद नहीं करना चाहेगा. लेकिन जिन्होंने उसे झेला है. वे चाहकर भी उसे कभी भुला नहीं पायेंगे.....एम्स के अंदर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पार्थिव शरीर था और बाहर हजारों की भीड़ इकट्ठा थी. उस भीड़ में हिंदू भी थे, मुसलमान भी और सिख भी. लेकिन फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि भीड़ में शामिल सिख वहां से हटने लगे....इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले दोनो बॉडीगार्ड सिख थे. इसी बात पर दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में सिखों को निशाना बनाया जाने लगा. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी इसका शिकार बने. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की खबर मिलते ही राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह अपना यमन दौरा बीच में ही छोड़कर देश लौटे थे. वह एयरपोर्ट से सीधे एम्स जा रहे थे. शाम के करीब पौने पांच बजे एम्स से लगभग एक किलोमीटर पहले करीब 20 लोगों का गुट हाथ में मशाल और लोहे की छड़ लिए हुए सिख विरोधी नारे लगा रहा था. तभी उधर से ज्ञानी जैल सिंह का काफिला गुजरा. भीड़ में से कुछ लोगों ने राष्ट्रपति के काफिले पर हमला कर दिया. इस हमले में काफिले की आखिरी कार के शीशे टूट गये....
तरलोचन सिंह उस दिन उसी कार में मौजूद थे. तब वह राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के प्रेस सेक्रेटरी हुआ करते थे. तरलोचन सिंह बताते हैं कि कुछ लड़के शाउटिंग कर रहे थे उन्होंने मेरी कार पर हमला किया मैं किसी तरह बच कर राष्ट्रपति भवन गया. दूसरा हमला फिर राष्ट्रपति के एम्स से निकलने के बाद हुआ.....राष्ट्रपति के एम्स से निकलने के बाद हिंसा की वारदातें एम्स के आसपास के इलाकों में फैलने लगी. पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज दिल्ली की पहली घटना अरबिन्दो मार्ग पर हुई जहां एक सिख की मोटरसाइकिल जला दी गयी थी. लेकिन इस तरह की कई वारदातें एक साथ कई जगहों पर हो रही थीं. कहीं सिखों को पीटा जा रहा था तो कहीं उनकी गाड़ियां जलाई जा रही थीं. कहीं उनके घरों और दुकानों में लूटपाट हो रही थी.....इस बीच राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण समारोह खत्म हो चुका था. दिल्ली में हालात ऐसे हो गये थे कि ज्ञानी जैल सिंह के पास मदद के लिए लोगों के फोन आने लगे. तब जैल सिंह ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को फोन किया. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कहा था कि राजीव जी दिल्ली में हालात बहुत खराब हैं. मेरी यह सलाह है कि बिना किसी देरी के आर्मी को बुला लेना चाहिए.
राजीव गांधी ने कहा था कि मेरी हालात पर नजर है. अगर पुलिस फोर्स हालात को काबू में नहीं कर पाती है तो आर्मी को मदद के लिये बुलाया जाए. तरलोचन सिंह बताते हैं कि राष्ट्रपति कुछ कर नहीं पा रहे थे.
महीप सिंह ने बताया कि ज्ञानी जैल सिंह एक तरह से बेबस जैसा महसूस करने लगे थे. राष्ट्रपति हमारे यहां तीनों सेनाओं का प्रमुख होता है वह चाहे तो आज्ञा दे सकता है मगर स्थिति ऐसी हो गयी थी की जैल सिंह वैसा नहीं कर सके और अपनी आंखों के सामने वह सब होते देखते रहे....राष्ट्रपति बेबस थे लेकिन उनसे भी ज्यादा बेबस थे वे सिख जो दिल्ली और देश के दूसरे कई हिस्सों में हिंसा का शिकार बन रहे थे. अब तक ये हिंसा सिर्फ मारपीट, लूटपाट और आगजनी तक ही सीमित थी. दंगा पीड़ितों के वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि असली जो कत्ले आम शुरू हुआ पहली नवंबर को सुबह शुरू हुआ. जैसे किसी ने स्विच ऑन कर दिया हो इस तरह से एकदम से सारी दिल्ली में. सबके हाथों में रॉड सारी दिल्ली में एक पाउडर जिसको जहां फेंको वहां आग लग जाती थी. उसे केवल एक्सपर्ट यूज कर सकते थे. सबसे पहले गुरूद्वारे को आग लगाई फिर घरों को . सारी दिल्ली में पुलिस ने पहले जाकर सिखों के हथियार छीने कहा हम आपको बचाएंगे. आप अपने अपने एरिये मे जाओ. जिस-जिस एरिया में उन्होंने अपने हथियार पुलिस को दे दिए वहां सिखों को मार दिया.
31 अक्टूबर को एक प्रधानमंत्री की हत्या हुई लेकिन 1 नवंबर से जो हुआ वह लोकतंत्र की हत्या थी. दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, बोकारो, इंदौर और मुरैना जैसे कई दूसरे शहरों में सिखों की हत्याएं शुरू हो गयीं. अगले तीन दिन में देशभर में हजारों सिख मारे गये. लेकिन सबसे ज्यादा बुरी हालत थी दिल्ली में. बावजूद इसके कि देश की सरकार अपनी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ दिल्ली में बैठी थी, अकेले दिल्ली में करीब तीन हजार सिखों की हत्या हुयी....पत्रकार जरनैल सिंह ने बताया कि रात को मीटिंग्स हुईं. रामपाल सरोज जैसे नेताओं के घर मीटिंग्स हुईं. एचकेएल भगत के यहां मीटिंग हुयी उसके बाद सफेद पाउडर उपल्ब्ध कराया गया. कांग्रेस के लीडर्स ने वोटर लिस्ट दिलाई....पत्रकार तवलीन सिंह ने बताया कि ये एक सोची समझी साजिश थी सिखो को सबक सिखाने की.जिसके पीछे सरकार थी. हिंदुस्तान के इतिहास में इससे पहले कभी भी किसी सरकार या किसी राजनीतिक दल पर इतने गंभीर आरोप नहीं लगे थे. यह आरोप लगाने वाले कोई एक दो लोग नहीं बल्कि सैकड़ों लोग थे. कितने ही लोगों ने कांग्रेस के छोटे-बड़े नेताओं के उस हिंसक भीड़ में शामिल होने का दावा किया.
एच के एल भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, धर्मदास शास्त्री, यह कुछ ऐसे नाम हैं जिनके खिलाफ कितने ही लोग गवाही दे चुके हैं. कुछ अपने बयानों से पलटे भी. नतीजा यह हुआ कि कानून की नजर में अब तक इनमें से किसी पर भी दोष साबित नहीं हुआ है. यही वजह है कि हजारों सिख परिवारों के लिए 30 साला पुराना वह जख्म आज भी उतना ही ताजा है.
पूर्वी दिल्ली में कल्याणपुरी, शाहदरा. पश्चिमी दिल्ली में सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, नांगलोई. दक्षिणी दिल्ली में पालम कॉलोनी और उत्तरी दिल्ली में सब्जी मंडी और कश्मीरी गेट जैसे कुछ ऐसे इलाके हैं जहां सिखों के पूरे-पूरे परिवार खत्म कर दिए गये....
राहुल बेदी उन तीन पत्रकारों में से एक हैं जिन्होने सबसे पहले त्रिलोकपुरी में हुई हैवानियत को अपनी आंखों से देखा. राहुल बेदी बताते हैं कि हम थाने पहुंचे वहां एक ट्रक पर लाशें पड़ी थीं. एक लड़का जिंदा था उसने हमें बताया कि वहां सबको मार दिया गया.....कल्याणपुरी थाने के अंतर्गत आने वाले त्रिलोकपुरी में ज्यादातर गरीब सिख परिवार रहा करते थे. नानावटी कमीशन में दिये गये हलफनामों के मुताबिक त्रिलोकपुरी में हिंसा की शुरूआत 1 नवंबर की सुबह 10 बजे के करीब हुई. करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ पहले ब्लॉक नंबर 36 के गुरूद्वारे के पास इकट्ठा हुई. कुछ ही मिनटों में गुरुद्वारे को आग लगा दी गयी.
साधु सिंह नाम के व्यक्ति ने नानावटी कमीशन को दिए बयान में कहा कि उस भीड़ में स्थानीय कांग्रेस नेताओं के साथ पुलिस वाले भी मौजूद थे. गुरुद्वारे को जलाने के बाद यह भीड़ ब्लॉक 32 की तरफ बढ़ी. यहां के सिख परिवारों ने उनके पास मौजूद कृपाण और कुछ छोटे हथियारों की मदद से इकट्ठा होकर भीड़ का मुकाबला करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने खुद सुरक्षा देने का भरोसा दिलाकर सिखों के सारे हथियार ले लिए और उन्हें अपने अपने घर लौट जाने के लिए कहा.
पत्रकार राहुल बेदी बताते हैं कि 72 घंटो में कत्लेआम हुआ. हथियार ले लिए गये थे. त्रिलोकपुरी में 190 घरों में आग लगा दी गयी. 6 पुरूषों को छोड़कर सारे सिख पुरूषों को मार दिया गया. और मारने के बाद केरोसीन डालकर उन्हें जला दिया गया....तब त्रिलोकपुरी में रहने वाली तीरथ कौर ने अपनी आंखों से अपने परिवार के 7 लोगों को मरते देखा. तीरथ के मुताबिक जब वह बच्चों के साथ वहां से भागने लगीं तो दंगाइयों की नजर उनके बच्चों पर पड़ गयी. मैने कहा मेरे बच्चे को मत मारो मै उनके ऊपर लेट गयी वह मारते रहे. तीन दिन तक बच्चे के मुंह से खून आता रहा....नवंबर की दोपहर तक त्रिलोकपुरी में तीरथ कौर की तरह करीब 300 से ज्यादा महिलाएं विधवा हो चुकी थीं. यही नहीं भीड़ में शामिल लोगों पर महिलाओं से बलात्कार के भी आरोप लगे. आहुजा कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वी दिल्ली में 1234 सिख मारे गये थे जिसमें से 610 कत्ल सिर्फ कल्याणपुरी में हुये. वहीं पश्चिमी दिल्ली के सुल्तानपुरी और मंगोलपुरी जैसे इलाकों में भी सिखों की सामुहिक हत्याएं हुयीं....3 दिन और करीब 450 कत्ल. सुल्तानपुरी ब्लॉक A-4 में 1 नवंबर की दोपहर को हमला शुरू हुआ और 2 नवंबर की सुबह 9 बजे तक लगातार दंगाई सिखों को मारने और उनके घरों को जलाने में लगे रहे. लगभग पूरा का पूरा ब्लॉक तबाह कर दिया गया. लेकिन इसी ब्लॉक के मकान नंबर 165 में रहने वाली पद्मी कौर के घर जो हुआ वह और भी ज्यादा शर्मनाक था....वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि एक लड़की की 2 नवंबर को शादी थी. सारे रिश्तेदार उसके घर पर थे. पहली नवंबर को भीड़ ने हमला किया. रंगनाथ मिश्रा कमीशन को दिए बयान में पद्मी कौर ने कहा कि उन्होंने मेरी बेटी को पकड़ा और उसके कपड़े फाड़ने लगे. मेरे पति ने हाथ जोड़कर उनसे कहा कि उसे छोड़ दें. उन्होंने मेरे पति को मारने की धमकी दी. फिर मेरी बेटी के हाथ पैर तोड़े और उसे उठा ले गये. इसके बाद भीड़ ने मेरे पति और घर में मौजूद दूसरे लोगों को मारना शुरू कर दिया....वकील एच एस फुल्का ने बताया कि 9 लोगों को मार दिया और लड़की को उठा ले गये. 3 दिन बाद लड़की आयी तो पागल जैसी हो गयी थी. अक्सर यह सफाई दी जाती रही है कि 1984 में जो हुआ वह इंदिरा गांधी की हत्या की प्रतिक्रिया थी, लोगों का गुस्सा था. लेकिन क्या सुल्तानपुरी की पद्मी कौर की बेटी के साथ जो हुआ या फिर त्रिलोकपुरी की विधवाओं के साथ जो किया गया, वह कुछ ऐसे लोगों का गुस्सा था जो अपने नेता की हत्या से दुखी हों या फिर कुछ दंगाइयों की दरिंदगी ?
तरलोचन सिंह बताते हैं कि दिल्ली के लोगों ने सिखों को बचाया यह जो गुंडे थे यह बाहर से लाये गये. मंगोलपुरी में शायद कोई गुरूद्वारा ऐसा नहीं बचा था जिस पर हमला न किया गया हो, जिसे जलाया न गया हो. अचानक कहीं से एक भीड़ आती थी, गुरुद्दारे में लूटपाट करती थी और फिर आग लगा देती थी. सवाल ये भी था कि आखिर यह भीड़ आ कहां से आ रही थी. ऐसा कैसे हो रहा था कि पूरी दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर एक ही तरीके से, एक ही पैटर्न पर सिखों को निशाना बनाया जा रहा था. एक सफेद पाउडर, जलता हुआ टायर, केरोसीन और मिट्टी का तेल और कुछ सौ लोगों की भीड़ . आखिर कहां से आ रहा था यह सब?
पत्रकार जरनैल सिंह बताते हैं कि बाकायदा रोहतक से ट्रेन लगाई गयी. कातिलों को जेल से छोड़ा गया. हरियाणा रोडवेज और डीटीसी की बसें लगाई गयीं ड्राइवरों को ड्यूटी लगाई गयी. तेल के डिपों के मालिकों से कहा गया कि आपको मिट्टी का तेल प्रोवाइड कराना है. पुलिस को कहा गया कि आपको जहां अगर विरोध हो वहां जाना है वरना आपको एफआईआर दर्ज नहीं करनी है....उस वक्त नांगलोई की जे जे कॉलोनी में रहने वाली बिशन कौर ने अपने हलफनामे में लिखा है कि हमले की घटनाओं के बाद गुरूद्वारे के ग्रंथी साहब ने लाउडस्पीकर पर सिखों को गुरूद्वारे में इकट्ठा होने के लिए कहा. इसके बाद लगभग सभी सिख गुरूद्वारे में इकट्ठा हो गये. भीड़ ने उस गुरूद्वारे पर हमला कर दिया. लेकिन सिखों ने भीड़ को गुरूद्वारे में घुसने नहीं दिया. उसी दिन करीब 12 बजे रोहतक की तरफ से एक ट्रेन आयी जिसमें से सैकड़ों लोग उतरे. उनके हाथ में लोहे की रॉड थी और साथ में एक सफेद केमिकल. इन लोगों ने सिखों के घरों पर वह सफेद केमिकल फेंककर आग लगाना शुरू कर दिया. इस तरह बिशन कौर के पति समेत नांगलोई में कुल 122 सिख मारे गये...पत्रकार महीप सिंह बताते हैं कि तीन से चार दिन तो अबाध रूप से हत्यायें होती रहीं. सेना नहीं बुलाई गयी. पुलिस दंगाइयों के साथ जुड़ गयी. सिखों के घर जलाये जा रहे थे और पुलिस का रोल ये था कि पुलिस कहती थी कि जो करना है जल्दी कर लो क्योंकि ज्यादा समय नहीं है....उन तीन दिनों में दिल्ली में जो हुआ उससे पुलिस की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठे. जितनी भी वारदातें हुईं चाहे वह टैक्सी और ट्रक जलाने की घटनाएं हो या फिर घरों और गुरूद्वारों को जलाने के मामले. पुलिस हर जगह मौजूद थी लेकिन सिर्फ मूक दर्शक की तरह. बल्कि ज्यादातर मामलों में तो पुलिस पर दंगाइयों के साथ शामिल होने के आरोप लगे...पत्रकार जरनैल सिंह ने कहा कि पुलिस यहां आश्रम में लोगों को भड़का रही थी कि सिखों ने हिंदुओं की ट्रेन काटकर पंजाब से भेजी है. उन्होंने जहर मिला दिया है पानी में. इस तरह की अफवाहें फैलाइ जा रही थीं....निरप्रीत कौर तब 16 साल की थीं. दिल्ली के वेंकटेश्वर कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई करने वाली निरप्रीत 1984 में पालम के राजनगर में अपने परिवार के साथ रहा करती थीं. लेकिन 2 नवंबर 1984 को जो हुआ उससे निरप्रीत का भरोसा ऐसा टूटा कि वह उग्रवादियों के साथ जुड़ने को मजबूर हो गयीं. निरप्रीत के गुस्से की वजह भी दंगाइयों से ज्यादा वह पुलिस है जिसने उनके पिता के साथ धोखा किया.
निरप्रीत कौर बताती हैं कि पुलिस के कहने पर मेरे फादर साहब गये काम्प्रोमाइज के लिए और पुलिस इंस्पेक्टर कौशिक ने माचिस दी जिससे मेरे पिता को जिंदा जलाया गया. जब मै वापस आयी मेरे पिता जल गये मैं दौड़ के घर के अंदर की तरफ आयी हूं और मैने देखा कि मेरी मां बेहोश पड़ी है और हमारे घर में पुलिस खड़ी है. और हमारे घर को आग लगी हुई है. ये है पुलिस का रोल...निरप्रीत जिस राजनगर में रहती थीं वहां सिखों के 250-300 परिवार थे. जब सिखों पर हमले शुरू हुए तो इनमें से ज्यादातर लोग निरप्रीत के घर पर इकट्ठा हो गये. यह लोग डटकर दंगाइयों का मुकाबला करने लगे. इसी वजह से भीड़ ने पुलिस की मदद से निरप्रीत के पिता निर्मल सिंह को निशाना बनाया...निरप्रीत कौर बताती हैं कि मैने अपनी आंखों के सामने अपने पिता को जिंदा जलते देखा. तीन बार मेरे पिता ने बचने की कोशिश की. नाले में गिरे हैं और उन्होंने फिर बाद में लाठियां मारी हैं. सरिये से मारा है. चार घंटे हमने हिफाजत खुद की है. चार घंटे बाद इन्होंने धोखे से मेरे पिता को भीड़ के सामने कर दिया...निरप्रीत कौर ने पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता सज्जन कुमार के खिलाफ कोर्ट में गवाही दी. सज्जन कुमार समेत 6 लोगों पर दिल्ली कैंट में 5 सिखों की हत्या का मामला दर्ज हुआ. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने बाकी 5 को दोषी मानते हुए सज्जन कुमार को इसमें बरी कर दिया...राजनगर, सागरपुर, महावीर एनक्लेव और द्वारकापुरी – दिल्ली कैंट के वो इलाके हैं जहां सिख विरोधी हिंसा में सबसे ज्यादा मौते हुईं. हिंसा के शिकार लोग जब पुलिस से मदद मांगने गये तो पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इंकार कर दिया. आहूजा कमेटी के मुताबिक दिल्ली कैंट में 341 सिखों की हत्या हुईं लेकिन यहां सिर्फ 5 एफआईआर दर्ज हुयीं.
वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि दिल्ली कैंट के केस में जगदीश कौर ने बयान दिया कि उसके पति और बेटे को मार दिया. दो दिन तक लाशें पड़ी रहीं फिर उसने घर की चारपाइयों की लकड़ी से उनका अंतिम संस्कार किया.
क्या पुलिस हिंसा के शिकार लोगों की मदद इसलिए नहीं कर रही थी क्योंकि उन पर ऊपर से दबाव था. सब्जी मंडी पुलिस स्टेशन की कहानी यही साबित करती है. 31 अक्टूबर 1984 को एसएचओ गुरमेल सिंह थे. वह खुद सिख थे. यही नहीं उस दिन सब्जी मंडी सब डिवीजन के एसीपी भी एक सिख थे जिनका नाम केवल सिंह था. 31 अक्टूबर को जब हिंसा की घटनाएं शुरू ही हुयी थीं तब पूरी दिल्ली में यह पहला थाना था जहां दंगाइयों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज हुई. लेकिन उसके कुछ घंटो के अंदर ही दोनों पुलिसवालों को यहां से हटा दिया गया. 1990 में कुसुम लता मित्तल ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ कहा कि उन दोनों पुलिसवालों को सिर्फ इसलिए हटाया गया क्योंकि वह स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे थे. 1 नवंबर से यहां भी वही हुआ जो बाकी दिल्ली में हो रहा था...उन तीन दिनों में सिखों के परिवार के परिवार खत्म किए जा रहे थे और उन हिंदुओं को भी निशाना बनाया जा रहा था जो सिख परिवारों की मदद कर रहे थे. वकील एच एच फुल्का बताते हैं कि दिल्ली में एक भी जगह ऐसी नहीं थी जहां सिख सेफ हो छुपने के लिए भी नहीं थी. साउथ एक्स में मेरे घर पर हमला हुआ. लैंडलॉर्ड एम्स ले गये वहां सेफ नहीं लगा तो एय़रफोर्स के मेरे दोस्त ने साकेत में दो दिन तक मुझे छुपा कर रखा. ये हालत थी सारी दिल्ली की एक भी जगह सेफ नहीं थी...दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में भी सिर्फ आग और धुंए का गुबार दिख रहा था. अपनी तस्वीरों के जरिए 1984 का सच सामने लाने वाले फोटोग्राफर अशोक वाही कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ देखा वह मंजर रोंगटे खड़े कर देने वाला था...संसद से कुछ ही दूरी पर स्थित गुरूद्वारा रकाबगंज साहब भी भीड़ के निशाने पर आया. नानावटी आयोग को दिए गये हलफनामों के मुताबिक यहां 4 से 5 घंटों तक कुछ हजार लोगों की भीड़ हंगामा करती रही. हलफनामों के मुताबिक कांग्रेसी नेता कमलनाथ को भी इस भीड़ में काफी देर तक मौजूद देखा गया.
पत्रकार जरनैल सिंह बताते हैं कि गुरूद्वारा रकाबगंज साहब पर भी हमला किया गया. वहां बाहर कमलनाथ वसंत साठे पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन वहां खड़े थे गुरूद्वारा साहब पर गोलियां चलाई गयीं. ये नानावटी कमीशन की रिपोर्ट है. मुख्यतियार सिह का हलफनामा है उसमें उन्होंने बताया है कि किस तरह से दो सिखों को जला दिया गया...उन तीन दिनों में अगर गरीब सिख बस्तियों को पूरी तरह तबाह किया गया तो तथाकथित वीआईपी इलाके भी बहुत सुरक्षित नहीं थे. मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने अपनी आंखों से खान मार्केट में दंगाइयों को पुलिस की मौजूदगी में आगजनी और लूटपाट करते देखा. इसके बाद उन्होंने अगली दो रातें स्वीडश एम्बैसी में रहकर गुजारी.
खास हो या आम. 84 के उन तीन दिनों में शायद ही ऐसा कोई सिख परिवार हो जो किसी न किसी तरह से उस हिंसा का शिकार न बना हो. एयरफोर्स के ग्रुप कैप्टन मनमोहन बीर सिंह तलवार को 1971 में पाकिस्तानी हवाई हमले को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. लेकिन शर्म है कि दंगाइयों ने देश का गौरव बढ़ाने वाले उस वीर को भी निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि वह सिख थे. 84 में कैप्टन तलवार अपने परिवार के साथ पटेल नगर में रहते थे.
वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि पटेल नगर में ग्रुप कैप्टन मोहन वीर सिंह तलवार के घर पर अटैक हुआ. पुलिस को फोन किया पुलिस नहीं आयी. जब घर को आग लगा दी तब उन्होंने फायरिंग की भीड़ हटाने के लिए. मगर जब पुलिस शाम को पहुंची, आर्मी पहुंची तब उन्होंने तलवार के घर पर अटैक किया और उसे अरेस्ट किया. भीड़ में से एक आदमी नहीं पकड़ा. जब एसएचओ से मैंने पूछा तो उसने कहा भीड़ बहुत ज्यादा थी हम कम थे. 15 दिन वो जेल में रहा...1984 के वो तीन दिन दिल्ली के ज्यादातर सिख परिवारों पर कहर बनकर टूटे. हिंसक भीड़ उन्हें मारने पर आमादा थी और पुलिस उस भीड़ की मदद कर रही थी. लेकिन 3 नवंबर को इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के साथ ही यह हिंसा थम गयी.
फुल्का बताते हैं कि आर्मी इफ्केटिव हुई. 3 नवंबर को तब एकदम वायलेंस खत्म हो गयी. पहली नवंबर को शुरू हुई जैसे किसी ने स्विच औन किया हो तीन नवंबर को एकदम खत्म हुई जैसे किसी ने स्विच बंद कर दिया हो. आमतौर पर कहा जाता है कि 72 घंटे इन्होंने दिये थे सिखों को सबक सिखाने के लिए और जब वह पूरे हुए तो उन्होने स्विच बंद कर दिया...सिख विरोधी हिंसा में पुलिस की भूमिका की जांच के लिए कपूर मित्तल कमेटी बनाई गयी. 1990 में इस कमेटी ने 6 आईपीएस अफसरों समेत 72 पुलिसवालों पर कार्रवाई की सिफारिश की. लेकिन इनमें से कुछ एक मामलों को छोड़कर ज्यादातर पुलिसवालों को प्रमोशन मिलता रहा और कुछ सम्मान के साथ रिटायर हो गये....पुलिस के रवैये की वजह से हजारों बेगुनाह मारे गये और गुनहगार बच गये. न दोषी पुलिसवाले पकड़े गये, न उन नेताओं को सजा मिली जिनके इशारे पर सब हुआ. न वो लोग जिन्होंने खुद हत्याओं को अंजाम दिया. 2733 सिखों की हत्या के मामले में अब तक सिर्फ 49 लोगों को उम्र कैद की सजा हुयी है. ज्यादातर केस सबूतों के अभाव में बंद कर दिये गये. इस सब की वजह है कि उन तीन दिनों में दिल्ली के 76 पुलिस थानों में से ज्यादातर में कोई एफआईआर ही नहीं दर्ज की गयी....पत्रकार जरनैल सिंह बताते हैं कि अगर एफआईआर दर्ज करनी भी पड़ी तो यह किया कि भीड़ ने 300 लोगों का यहां कत्ल किया दो लाइन की एफआईआर में. कौन लीड कर रहा था किसने मारा कोई तफ्तीश ही नहीं है. क्या इस दो लाइन की एफआईआर में केस कभी प्रूव हो सकता है.....उन तीन दिनों में जो हुआ उसने राजीव गांधी सरकार को शुरु में ही कटघरे मे खड़ा कर दिया. लेकिन हिंसा थमने के कुछ दिनों बाद राजीव गांधी ने दिल्ली के बोट क्लब में जो बयान दिया वह और ज्यादा चौंकाने वाला था. राजीव गांधी ने कहा कि जब कोई बहुत बड़ा और भारी भरकम पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलती तो है ही.
3 कमीशन और 7 कमेटियों ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा की जांच की. सबने माना जो हुआ बहुत गलत हुआ. इसी साल सिख विरोधी हिंसा की जांच के लिए SIT के गठन की घोषणा भी की गई लेकिन इतने सब के बावजूद हिंसा के शिकार आज भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं.